रेल बजट की पटरी पर चढ़ा अमरकंटक का सपना, जनपक्षीय पत्रकारिता, कक्का की चौपाल और ज़मीन से उठी आवाज़ को मिली विकास की स्वीकृति...
अनूपपुर।विकास की असली कहानी अक्सर फाइलों में नहीं, बल्कि ज़मीन से उठी आवाज़ों में लिखी जाती है । अनूपपुर–शहडोल अंचल के लिए अमरकंटक तक रेल विस्तार की घोषणा उसी जनसंघर्ष और जनपक्षीय पत्रकारिता की जीत मानी जा रही है, जिसकी नींव वर्षों पहले रखी गई थी। रेल बजट 2025–26 में दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे द्वारा नए रेल सर्वे प्रस्तावों को शामिल किया जाना इस बात का संकेत है कि अब यह अंचल विकास की मुख्यधारा में कदम रखने को तैयार है।
वरिष्ठ पत्रकार कैलाश पाण्डेय की सतत रिपोर्टिंग और उनके चर्चित कॉलम ‘कक्का की चौपाल’ में बार-बार उठाए गए सवालों ने जिस मुद्दे को जीवित रखा, वही आज नीति और बजट का हिस्सा बन चुका है।
अनूपपुर विकास मंच के सक्रिय पदाधिकारी और वरिष्ठ अधिवक्ता वासुदेव चटर्जी के अनुसार यह फैसला सत्ता की कृपा नहीं, बल्कि जनसंवाद और सार्वजनिक विमर्श का परिणाम है। अमरकंटक, जो नर्मदा उद्गम स्थल होने के कारण देशभर के श्रद्धालुओं और पर्यटकों का केंद्र है, अब तक रेल सुविधा से वंचित रहा...पेंड्रा–अमरकंटक–डिंडोरीमंडला रेल लाइन के सर्वे को मंजूरी मिलना न केवल धार्मिक पर्यटन, बल्कि शिक्षा और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी नई संभावनाओं के द्वार खोलेगा, इसी कड़ी में जयसिंहनगर–शहडोल रेल लाइन और अंबिकापुर–गढ़वा जैसे प्रस्ताव पूरे क्षेत्र को रणनीतिक रेल नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में अहम कदम हैं।
इस विकास का सीधा लाभ इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय (IGNTU), अमरकंटक को भी मिलेगा, जहां दूर-दराज़ से आने वाले विद्यार्थियों के लिए बेहतर कनेक्टिविटी शिक्षा को अधिक सुलभ बनाएगी, साथ ही प्रस्तावित औद्योगिक विस्तार से रोजगार, कौशल विकास और अकादमिक, औद्योगिक समन्वय को गति मिलेगी...
कक्का की चौपाल की वह पंक्ति आज सार्थक होती दिख रही है। बजट में नाम आना ही पहली जीत है।रेल बजट 2025–26 ने अमरकंटक और पूरे अंचल को यही पहली जीत सौंप दी है।
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